Sunday, 22 October 2017

आसान तर्जुमा - -

ज़िन्दगी इतनी भी मुश्किल
ज़ुबां नहीं, यूँ तो मैंने हर
इक सांस में जिया है
उनको अफ़सोस
यही कि,
उनके पास  कोई तर्जुमा नहीं।
जिस्म ओ जां से उठ कर
रूह तक सुलगता रहा,
कहने को हद ए
नज़र रौशन
कोई शमा नहीं। सारी दुनिया
इक दायरा ए कूचे में सिमट
आई कौन कहता है कि
दिल में  वजूद ए
आसमां नहीं।
सब कुछ तो है यहाँ फिर भी
वो उदास रहता है, भीड़
भरे शहर में शायद
उसका कोई
हमनवा
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल

Thursday, 5 October 2017

मुखौटों के परे - -

 ऊसर खेत, मेघविहीन आकाश और
सांझ बेला के यात्री, आईने के
इस पार हूँ मैं, और उस
पार मौन अट्टहास।
विवर्ण दीवारें,
उखड़ते
पलस्तर, जीर्ण शीर्ण अतीत का श्वेत 
श्याम अलबम, अधखुली खिड़की
से झांकता हो जैसे लौटता
हुआ मधुमास। तुम
साथ हो या नहीं,
अब जैसे
कोई
फ़र्क़ पड़ता नहीं, सांध्य आरती, देह
से उठता हुआ धुआं, लहरों पर
बहते हुए असंख्य प्रदीप,
क्रमशः चप्पुओं की
आवाज़ थमती
हुई, और
धीरे -
धीरे अंधकार, अस्तित्व को अपने में -
अन्तःसलिल करती हुई - - अब
सिर्फ़ है कुछ अपने पास, तो
वो है अवकाश ही
अवकाश।

* *
- शांतनु सान्याल 


Sunday, 1 October 2017

उसने कहा था - -

बहोत कुछ उसने कहा
था यूँ ख़ामोश
निगाहों से
ताउम्र
आती रही सदायें, यूँ - -
ख़ानाबदोश राहों
से। उम्र की
तहरीर
थी कि बढ़ती रही  दम -
ब - दम हाशिए तक
न पहुँच पाए
नूर उन
ख़्वाबगाहों से। हर एक
चेहरे पे था गोया
कोई इसरार
ए पोशीदा,
हमने
भी सीख लिया जीना
इन पागल हवाओं
से। रास्ता नहीं
मिलता है
कभी
मख़मली या मनचाहा,
जब दवा ख़ुद
निकल
आए
दिल के रिसते घाओं से,
ज़िन्दगी ख़ुद ब ख़ुद
उभर आती है दर्द
के पनाहों
से।

* *
- शांतनु सान्याल


Thursday, 21 September 2017

दरमियान ए असल ओ सूद - -

तमाम अशराफ़िया* उनकी महफ़िल -
में रहें मौजूद, हमारी दुनिया ख़ुश
है लरज़ते ज़मीन के बावजूद।
ख़ौफ़ज़दा रहें वो, जो हों
शीशमहल के 
रहने वाले,
हमारे इर्दगिर्द है पत्थरों की इक दिवार
लामहदूद। बियाबां में राह तलाशने
के, हैं हम जन्म से माहिर रूकती 
नहीं ये ज़िन्दगी,चाहे क़दम
रहें खूं आलूद। बिरादरी
है अपनी आबाद,
बर हस्ब, 
राह ऐ  फ़कीरी, वो उलझे रहें उम्र भर -
दरमियान ए असल ओ सूद।

* *
- शांतनु सान्याल 

* संभ्रांत लोग 

Saturday, 16 September 2017

जाली मुस्कान - -

सच बोलने का हासिल हमसे पूछो
न यारों तमाम वाबस्तगी इक
पल में निकले  बेगाने।
उनके हाथों में
था यूँ भी
इंसाफ़ का तराज़ू, दलील ए जुर्म, -
हम जाने या सिर्फ ख़ुदा
जाने। ख़ामोश था
शहर, जब पा
ए ज़ंजीर
हम गुज़रे, शाम ढलने से पहले, - -
वो लगे महफ़िल सजाने।
वादी ए तारीख़ पे,
वीरानगी के
सिवा
कुछ भी नहीं, यहाँ अब कोई नहीं
आता रस्मो रिवाज निभाने।
मुद्दतों बाद वो मिले
ज़रूर लेकिन
बेरुख़ी
ओढ़े हुए, जाली मुस्कानों में थे - -
छुपे हुए अनगिनत  बहाने।

* *
- शांतनु सान्याल



 

Saturday, 9 September 2017

दूर तक कोई नहीं - -

वैसे तो यहाँ  रहनुमाओं की
कोई कमी नहीं, फिर भी
ज़िन्दगी लौट आती
है अक्सर किसी
अवितरित
लिफ़ाफ़े की तरह, उम्र से
पहले बुढ़ापा ओढ़े हुए, 
दहलीज़ पर अपने,
बेतरतीब से
पड़े हुए।
तुम्हारे और मेरे दरमियान
आज भी है मौजूद शायद
वही पुराना पुल,
 हालाँकि
वक़्त ने बहती नदी को,
बहोत पहले ही चुरा
लिया हमसे, न
अब कोई
किनारा
रहा बाक़ी, और नहीं क़दमों
के निशां दूर तक, दस्तूर
ए ज़माने को बदलना
इतना भी
आसान
नहीं, माथे  से जब क़फ़न
हमने उतारा तो देखा,
तनहा खड़े थे हम
बीच चौक पर,
और ओझल
थे सभी
कारवां दूर तक।

* *
- शांतनु सान्याल

Saturday, 19 August 2017

कुछ बूंदें - -

कुछ बूंद उन शबनमी निगाह के,
कुछ दर्द मेरे सीने के, यही
सब तो हैं ख़ूबसूरत
वजूहात, बिंदास
मेरे जीने के।
वो आज
भी है दिलकश ओ हंसीं, पहले से 
बेशतर कहीं, उस जादुई -
रूमान से, यूँ दिल
मेरा भी, 
बेअसर
नहीं।
अभी अभी तो सजी है, मजलिस -
ए -आसमां दूर तक. बढे और
ज़ियादा हौले - हौले,
जज़्बात ए
कारवां
दूर तक। तिलस्म - ए - निगाह
का अभी रसूख़ ओ असर
बाक़ी है, अभी तो है
सिर्फ़ आग़ाज़
ए शब,
अभी कामिल सहर बाक़ी है - - -

* *
- शांतनु सान्याल