17 अक्तूबर, 2012

तीरगी ए हिजाब - -

वो तलाश जो ले जाए ख्याली दुनिया से परे,
हक़ीक़त की ज़मीं हो ज़ाहिर जहाँ, दिल 
चाहता है, फिर तीरगी ए हिजाब 
हटाना, चलों देखे ज़रा फिर 
बेनक़ाब ज़िन्दगी को 
बरअक्स आइना,
ये झिझक 
कैसी जो रोकती है, तन्हाई में भी लिबास -
बदलना, न जाने किस की निगाह है 
खुली रात दिन, न जाने कौन है, 
दर दाख़िल ओ ख़ारिज 
मुसलसल मौजूद, 
चाहता है, हर 
वक़्त, ज़मीर को मुक्कमल बदलना, राह ए 
उजागर की जानिब बढ़ना, ख़ुद को 
पाक इशराक़ से भरना - - 

- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
तीरगी ए हिजाब - अंधकार का पर्दा 
दर दाख़िल ओ ख़ारिज - अन्दर और बाहर 
पाक इशराक़ - पवित्र दीप्ती 
Oil Painting by Marina Petro 1

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